बालकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई।।
मूल पाठ
अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई।।
जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं।।
स्रोत अभिलेख 1.15 · पुस्तक पृ. 156, 157
भावार्थ
मूल पाठ के बादऐसा समझनेपर मनमें सन्देह होता है, फिर भी प्रभुने जो कहा वही प्रमाण (सत्य) है। [मैं तो यह माँगती हूँ कि] हे नाथ! आपके जो निज जन हैं वे जो (अलौकिक, अखण्ड) सुख पाते हैं और जिस परम गतिको प्राप्त होते हैं॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 157 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई।।
English explanation
“Understanding this, doubt arises in my mind; yet, Lord, what you have said is itself authoritative.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | thus; this |
| समुझत | समझते हुए | on understanding |
| मन | मन में | in the mind |
| संसय | संदेह | doubt |
| होई | होता है | arises |
| कहा | कहा | said |
| जो | जो | what |
| प्रभु | हे प्रभु | O Lord |
| प्रवान | प्रमाण; मान्य वचन | authoritative; valid |
| पुनि | फिर भी | nevertheless |
| सोई | वही | that very thing |
2 जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं।।
English explanation
“O Lord, whatever happiness your own devotees enjoy and whatever spiritual state they attain—”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जे | जो लोग | those who |
| निज | अपने; अनन्य | own; devoted exclusively |
| भगत | भक्त | devotees |
| नाथ | हे नाथ | O Lord |
| तव | आपके | your |
| अहहीं | हैं | are |
| जो | जो | whatever |
| सुख | सुख | happiness |
| पावहिं | पाते हैं | obtain; enjoy |
| जो | जो | whatever |
| गति | आध्यात्मिक गति; परम प्राप्ति | spiritual state; ultimate attainment |
| लहहीं | प्राप्त करते हैं | attain |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- बालकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 1.15
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 157
- सहायक विषय
- मनु-शतरूपा-तप एवं वरदान
- मुद्रित पृष्ठ
- 156, 157
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।