अयोध्याकाण्ड · श्लोक · श्लोक
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दरघुकुलको आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके मुखारविन्दकी जो शोभा राज्याभिषेकसे (राज्याभिषेककी बात सुनकर) न तो प्रसन्नताको प्राप्त हुई और न वनवासके दु:खसे मलिन ही हुई, वह (मुखकमलकी छबि) मेरे लिये सदा सुन्दर मङ्गलोंकी देनेवाली हो॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 343 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा॥२॥
स्रोत अभिलेख मंगलाचरण · पुस्तक पृ. 343, 343
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।
English explanation
That radiance of the lotus-like face which did not grow brighter at the prospect of coronation, nor fade through the sorrow of forest exile—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रसन्नतां | प्रफुल्लता को | brightness or gladness |
| या | जो | which |
| न | नहीं | not |
| गताभिषेकतस्तथा | राज्याभिषेक से पहुँची; उसी प्रकार | attained through coronation; likewise |
| न | नहीं | not |
| मम्ले | मुरझाई | withered or faded |
| वनवासदुःखतः | वनवास के दुःख से | from the sorrow of forest exile |
2मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा॥२॥
English explanation
May that radiance of Rama’s lotus-like face always bestow beautiful auspiciousness upon me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुखाम्बुजश्री | मुखरूपी कमल की शोभा | the radiance of the lotus-like face |
| रघुनन्दनस्य | रघुकुल को आनंद देने वाले राम की | of Rama, the joy of Raghu’s lineage |
| मे | मेरे लिए | for me |
| सदास्तु | सदा हो | may it always be |
| सा | वही | that same |
| मञ्जुलमङ्गलप्रदा | सुंदर मंगल देने वाली | bestowing beautiful auspiciousness |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- श्लोक
- स्रोत अभिलेख
- मंगलाचरण
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 343
- सहायक विषय
- मंगलाचरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 343, 343
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