अयोध्याकाण्ड · दोहा 311 · दोहा/सोरठा
सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।
सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।
राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.311 · पुस्तक पृ. 604, 604
भावार्थ और शब्दार्थ
1सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।
जम्हाई लेते समय भी राम का नाम कह देने से साधारण मनुष्य को भी सभी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं।
English explanation
Even an ordinary person can readily attain all spiritual accomplishments by uttering Rama’s name while yawning.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुलभ | सहज प्राप्त होने वाली | readily attainable |
| सिद्धि | सिद्धियाँ और आध्यात्मिक उपलब्धियाँ | spiritual accomplishments and powers |
| सब | सभी | all |
| प्राकृतहु | साधारण मनुष्य को भी | even to an ordinary person |
| राम | राम का नाम | Rama’s name |
| कहत | कहते हुए | uttering |
| जमुहात | जम्हाई लेते समय | while yawning |
2 राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।
इसलिए राम को प्राणों के समान प्रिय भरत के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है।
English explanation
Thus, for Bharata, whom Rama loves as dearly as his own life, this is no great matter.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम को | to Rama |
| प्रान | प्राणों के समान | as his own life |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| भरत | राम के भाई भरत | Bharata, Rama’s brother |
| कहुँ | के लिए | for |
| यह | यह अनुकूल सेवा और सुख | this favorable service and comfort |
| न | नहीं | not |
| होइ | है | is |
| बड़ि | बड़ी | great |
| बात | बात | matter |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 311
- स्रोत अभिलेख
- 2.311
- सहायक विषय
- भरतजीका तीर्थ-जल-स्थापन तथा चित्रकूटभ्रमण
- मुद्रित पृष्ठ
- 604, 604
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।