अयोध्याकाण्ड · दोहा 265 · दोहा/सोरठा
सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।
सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।265।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.265 · पुस्तक पृ. 564, 565
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।
देवताओं का विचार सुनकर उनके गुरु बृहस्पति ने कहा, ‘अच्छा है; तुम्हारा बड़ा सौभाग्य है।’
English explanation
Hearing the gods’ proposal, their preceptor Brihaspati said, ‘Good; great is your good fortune.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| सुर | देवताओं का | the gods’ |
| मत | विचार; प्रस्ताव | view; proposal |
| सुरगुर | देवगुरु बृहस्पति | Brihaspati, preceptor of the gods |
| कहेउ | कहा | said |
| भल | अच्छा है | good; well said |
| तुम्हार | तुम्हारा | your |
| बड़ | बड़ा | great |
| भागु | सौभाग्य | good fortune |
2 सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।265।।
जगत में समस्त शुभ मंगलों का मूल भरत के चरणों के प्रति प्रेम है।
English explanation
Love for Bharata’s feet is the root of all auspicious blessings in the world.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सकल | समस्त | all |
| सुमंगल | शुभ मंगलों का | of auspicious blessings |
| मूल | मूल; आधार | root; foundation |
| जग | जगत में | in the world |
| भरत | भरत के | Bharata’s |
| चरन | चरणों के प्रति | toward the feet |
| अनुरागु | प्रेम; अनुरक्ति | love; devoted affection |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 265
- स्रोत अभिलेख
- 2.265
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 564, 565
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