अयोध्याकाण्ड · दोहा 286 · दोहा/सोरठा
सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।
सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।
धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.286 · पुस्तक पृ. 582, 583
भावार्थ और शब्दार्थ
1सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।
माता-पिता के स्नेह से अभिभूत सीता व्याकुल हो गईं और अपने को सँभाल न सकीं।
English explanation
Overwhelmed by her parents’ affection, Sita became distressed and could not compose herself.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सिय | सीता | Sita |
| पितु | पिता | father |
| मातु | माता | mother |
| सनेह | स्नेह के | affection |
| बस | वश में | under the sway of |
| बिकल | व्याकुल | distressed |
| न | नहीं | not |
| सकी | सक सकीं | was able |
| सँभारि | अपने को सँभालना | to compose herself |
2 धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।।
फिर पृथ्वी की पुत्री सीता ने समय और अपने उचित धर्म का विचार करके धैर्य धारण किया।
English explanation
Then Sita, daughter of the earth, regained composure by considering the occasion and her proper duty.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| धरनिसुताँ | पृथ्वी की पुत्री सीता ने | Sita, daughter of the earth |
| धीरजु | धैर्य | composure |
| धरेउ | धारण किया | regained |
| समउ | समय और परिस्थिति | the occasion and circumstances |
| सुधरमु | उचित धर्म या कर्तव्य | proper duty |
| बिचारि | विचार करके | having considered |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 286
- स्रोत अभिलेख
- 2.286
- सहायक विषय
- कौसल्या-सुनयना-संवाद, श्रीसीताजीका शील
- मुद्रित पृष्ठ
- 582, 583
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