अयोध्याकाण्ड · दोहा 63 · दोहा/सोरठा
सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।।
सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।।
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।63।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.63 · पुस्तक पृ. 395, 396
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।।
जो स्वाभाविक हितैषी, गुरु और स्वामी की सीख को आदरपूर्वक स्वीकार करके उसका पालन नहीं करता—
English explanation
Whoever does not respectfully accept and follow the counsel of a natural well-wisher, teacher, or master—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सहज | स्वाभाविक, सहज | natural, innate |
| सुह्द | हितैषी, सुहृद | well-wisher, friend |
| गुर | गुरु | teacher, preceptor |
| स्वामि | स्वामी, अधिपति | master, lord |
| सिख | सीख, उपदेश | counsel, instruction |
| जो | जो व्यक्ति | whoever |
| न | नहीं | not |
| करइ | पालन करता है | follows |
| सिर | सिर पर; आदरपूर्वक | upon the head; respectfully |
| मानि | मानकर, स्वीकार करके | having accepted |
2 सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।63।।
वह हृदय में बहुत पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती है।
English explanation
That person deeply regrets it in their heart, and their welfare inevitably suffers.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह व्यक्ति | that person |
| पछिताइ | पछताता है | regrets |
| अघाइ | भरपूर, बहुत | deeply, greatly |
| उर | हृदय में | in the heart |
| अवसि | अवश्य | inevitably |
| होइ | होती है | occurs |
| हित | कल्याण, भलाई की | of one's welfare |
| हानि | हानि | loss, harm |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 63
- स्रोत अभिलेख
- 2.63
- सहायक विषय
- श्रीसीता-राम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 395, 396
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