अयोध्याकाण्ड · दोहा 215 · दोहा/सोरठा
संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।
संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.215 · पुस्तक पृ. 522, 522
भावार्थ और शब्दार्थ
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1संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।
संपत्ति चकवी थी, भरत चकवा थे और मुनि की आज्ञा उन्हें सँभालनेवाली थी।
English explanation
The wealth was the female chakravaka bird, Bharata the male, and the sage’s command their keeper.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| संपत | संपत्ति; ऐश्वर्य | wealth; abundance |
| चकई | चकवी; मादा चक्रवाक पक्षी | the female chakravaka bird |
| भरतु | राम के भाई भरत | Bharata, Rama’s brother |
| चक | चकवा; नर चक्रवाक पक्षी | the male chakravaka bird |
| मुनि | मुनि भरद्वाज की | of the sage Bharadvaja |
| आयस | आज्ञा | command |
| खेलवार | पक्षियों को सँभालनेवाला रखवाला | bird keeper |
2 तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।
उस रखवाले ने उस रात दोनों को आश्रम-रूपी पिंजरे में रखा, और भोर हो गई।
English explanation
That keeper held the two in the cage-like hermitage that night, until dawn came.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तेहि | उसने; उस रखवाले ने | that keeper |
| निसि | रात में | during the night |
| आश्रम | आश्रम-रूपी | the hermitage as |
| पिंजराँ | पिंजरे में | in a cage |
| राखे | दोनों को रखा | kept the two |
| भा | हो गया | came; became |
| भिनुसार | प्रभात; भोर | dawn; daybreak |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 215
- स्रोत अभिलेख
- 2.215
- सहायक विषय
- भरद्वाजद्वारा भरतका सत्कार
- मुद्रित पृष्ठ
- 522, 522
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