अयोध्याकाण्ड · दोहा 216 · दोहा/सोरठा
किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।
किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।
तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात।।216।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.216 · पुस्तक पृ. 523, 523
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।
बादल छाया करते चले जाते हैं और सुखद, उत्तम हवा बहती है।
English explanation
Clouds continue to provide shade, and a pleasant, lovely breeze blows.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| किएँ | करते हुए | providing |
| जाहिं | चले जाते हैं; करते रहते हैं | go on; continue |
| छाया | छाया | shade |
| जलद | बादल | clouds |
| सुखद | सुख देने वाली | pleasant; comforting |
| बहइ | बहती है | blows |
| बर | उत्तम; सुंदर | fine; lovely |
| बात | हवा | breeze |
2 तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात।।216।।
जैसा सुगम और सुखद मार्ग भरत के जाते समय हुआ, वैसा राम के लिए नहीं हुआ था।
English explanation
The path had not become as pleasant for Rama as it became for Bharata while he journeyed.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तस | वैसा | such; like that |
| मगु | मार्ग | path |
| भयउ | हुआ | became |
| न | नहीं | not |
| राम | राम | Rama |
| कहँ | के लिए | for |
| जस | जैसा | as |
| भा | हुआ | became |
| भरतहि | भरत के लिए; भरत को | for Bharata |
| जात | जाते समय | while journeying |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 216
- स्रोत अभिलेख
- 2.216
- सहायक विषय
- भरद्वाजद्वारा भरतका सत्कार
- मुद्रित पृष्ठ
- 523, 523
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।