अयोध्याकाण्ड · दोहा 85 · दोहा/सोरठा
राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।।
राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।।
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.85 · पुस्तक पृ. 413, 414
भावार्थ और शब्दार्थ
1राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।।
राम, लक्ष्मण और संभवतः सीता शिव के चरणों में सिर नवाकर रथ पर चढ़े; दिए गए पाठ का ‘सुय’ अस्पष्ट है।
English explanation
Rama, Lakshmana, and possibly Sita bowed their heads at Shiva’s feet and mounted the chariot; the supplied token ‘सुय’ is unclear.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम | Rama |
| लखन | लक्ष्मण, राम के छोटे भाई | Lakshmana, Rama’s younger brother |
| सुय | संभवतः सीता। | Probably Sita. |
| जान | रथ पर | onto the chariot |
| चढ़ि | चढ़कर; चढ़े | mounting; mounted |
| संभु | शंभु, शिव | Shiva |
| चरन | चरणों में | at the feet |
| सिरु | सिर | head |
| नाइ | नवाकर | having bowed |
2 सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।।
मंत्री सुमंत्र ने इधर-उधर मार्ग के निशान छिपाते हुए तुरंत रथ चला दिया।
English explanation
The minister Sumantra immediately drove the chariot, concealing its trail here and there.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सचिवँ | मंत्री सुमंत्र ने | the minister Sumantra |
| चलायउ | चला दिया | set in motion; drove |
| तुरत | तुरंत | immediately |
| रथु | रथ | the chariot |
| इत | इधर | here |
| उत | उधर | there |
| खोज | मार्ग के निशान | tracks; trail |
| दुराइ | छिपाकर | concealing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 85
- स्रोत अभिलेख
- 2.85
- सहायक विषय
- श्रीराम-सीता-लक्ष्मणका वनगमन और नगर-निवासियोंको सोये छोड़कर आगे बढ़ना
- मुद्रित पृष्ठ
- 413, 414
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।