अयोध्याकाण्ड · दोहा 324 · दोहा/सोरठा
राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।
राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।
चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.324 · पुस्तक पृ. 614, 615
भावार्थ और शब्दार्थ
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1राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।
राम के प्रेम के पात्र भरत केवल इस त्यागपूर्ण आचरण के कारण बड़े नहीं हैं।
English explanation
Bharata, a recipient of Rama’s love, is not great merely because of this renunciant conduct.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम के | of Rama |
| पेम | प्रेम के | of love |
| भाजन | पात्र | recipient |
| भरतु | भरत | Bharata, Rama’s brother |
| बड़े | महान | great |
| न | नहीं | not |
| एहिं | इस | this |
| करतूति | आचरण से | because of conduct |
2 चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।।
चातक और हंस क्रमशः अपनी एकनिष्ठता और विवेक की संपदा के लिए सराहे जाते हैं।
English explanation
The chataka bird and the swan are praised for their riches of steadfast devotion and discernment, respectively.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चातक | चातक पक्षी | the chataka bird |
| हंस | हंस पक्षी | the swan |
| सराहिअत | सराहे जाते हैं | are praised |
| टेंक | टेक; अडिग एकनिष्ठता | steadfast fidelity |
| बिबेक | विवेक; भेद पहचानने की क्षमता | discernment |
| बिभूति | संपदा; विशिष्ट गुण | riches; distinguished qualities |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 324
- स्रोत अभिलेख
- 2.324
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 614, 615
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