अयोध्याकाण्ड · दोहा 325 · दोहा/सोरठा
नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।।
नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।।
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।325।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.325 · पुस्तक पृ. 615, 616
भावार्थ और शब्दार्थ
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1नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।।
भरत नित्य प्रभु राम की पादुकाओं की पूजा करते हैं; उनका प्रेम हृदय में समाता नहीं है।
English explanation
Bharata daily worships Lord Rama’s sandals; his love is too great for his heart to contain.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नित | नित्य | daily |
| पूजत | पूजा करते हैं | worships |
| प्रभु | प्रभु राम की | of Lord Rama |
| पाँवरी | पादुकाएँ | sandals |
| प्रीति | प्रेम | love |
| न | नहीं | not |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| समाति | समाता है | is contained |
2 मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।325।।
बार-बार आज्ञा माँगकर भरत अनेक प्रकार के राजकाज करते हैं।
English explanation
Repeatedly seeking permission, Bharata carries out the many kinds of royal business.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मागि | माँगकर | having sought |
| मागि | बार-बार माँगकर | seeking repeatedly |
| आयसु | आज्ञा | permission; command |
| करत | करते हैं | carries out |
| राज | राज्य के | of the kingdom |
| काज | कार्य | affairs |
| बहु | अनेक | many |
| भाँति | प्रकार से | in ways |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 325
- स्रोत अभिलेख
- 2.325
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 615, 616
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