अयोध्याकाण्ड · दोहा 2 · दोहा/सोरठा
यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.2 · पुस्तक पृ. 345, 345
भावार्थ और शब्दार्थ
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1यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
यह विचार हृदय में लाकर राजा ने शुभ दिन और उपयुक्त अवसर पाया…
English explanation
With this thought in his heart, the king found an auspicious day and a suitable opportunity…
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| यह | यह | this |
| बिचारु | विचार | thought |
| उर | हृदय में | into his heart |
| आनि | लाकर | having brought |
| नृप | राजा दशरथ | King Dasharatha |
| सुदिनु | शुभ दिन | an auspicious day |
| सुअवसरु | उपयुक्त अवसर | a favorable opportunity |
| पाइ | पाकर | having found |
2 प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।।
प्रेम से शरीर पुलकित और मन प्रसन्न होने पर राजा ने गुरु के पास जाकर यह विचार सुनाया।
English explanation
With his body thrilled by love and his mind joyful, the king went to his preceptor and told him this thought.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रेम | प्रेम से | with love |
| पुलकि | रोमांचित होकर | thrilling; with hair standing on end |
| तन | शरीर | body |
| मुदित | प्रसन्न | joyful |
| मन | मन | mind; heart |
| गुरहि | गुरु वसिष्ठ को | to his preceptor Vashishtha |
| सुनायउ | सुनाया; बताया | related; told |
| जाइ | जाकर | having gone |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 2
- स्रोत अभिलेख
- 2.2
- सहायक विषय
- मंगलाचरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 345, 345
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