अयोध्याकाण्ड · दोहा 41 · दोहा/सोरठा
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।
तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.41 · पुस्तक पृ. 377, 378
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।
विशेषतः वन में मुनियों से मिलना होगा; वन जाना मेरे लिए हर प्रकार से हितकारी है।
English explanation
Especially, I shall meet sages in the forest; going there benefits me in every way.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनिगन | मुनियों के समूह से | with the sages |
| मिलनु | मिलना | meeting |
| बिसेषि | विशेष रूप से | especially |
| बन | वन में; वन जाना | in the forest; going to the forest |
| सबहि | सभी | every |
| भाँति | प्रकार से | way |
| हित | हितकारी | beneficial |
| मोर | मेरे लिए | for me |
2 तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।
उस पर पिता की आज्ञा भी है और, हे माता, तुम्हारी सहमति भी है।
English explanation
Added to that are my father’s command and, Mother, your own consent.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तेहि | उसमें; उस पर | to that |
| महँ | में | in addition |
| पितु | पिता की | my father’s |
| आयसु | आज्ञा | command |
| बहुरि | फिर; इसके अतिरिक्त | furthermore |
| संमत | सहमति | consent |
| जननी | हे माता | Mother |
| तोर | तुम्हारी | your |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 41
- स्रोत अभिलेख
- 2.41
- सहायक विषय
- श्रीराम-कैकेयी-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 377, 378
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