अयोध्याकाण्ड · दोहा 80 · दोहा/सोरठा
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।
सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.8 · पुस्तक पृ. 409, 410
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।
जिस उपाय से मेरी सभी माताएँ मेरे वियोग में दुख से दीन न हों—
English explanation
By whatever means all my mothers may be kept from becoming distressed and dejected by separation from me—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मातु | माताएँ | mothers |
| सकल | सभी | all |
| मोरे | मेरे | from me |
| बिरहँ | वियोग में | in separation |
| जेहिं | जिस उपाय से | by which means |
| न | न | not |
| होहिं | हों | become |
| दुख | दुःख से | by grief |
| दीन | दीन, व्याकुल | dejected, distressed |
2 सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।।
हे अत्यंत समझदार नगरवासियो, तुम सब वही उपाय करना।
English explanation
All you highly discerning citizens, adopt that very means.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोइ | वही | that very |
| उपाउ | उपाय | means |
| तुम्ह | तुम | you |
| करेहु | करना | carry out |
| सब | सब | all |
| पुर | नगर के | of the city |
| जन | निवासियो | residents |
| परम | अत्यंत | highly |
| प्रबीन | समझदार, विवेकी | discerning, wise |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 80
- स्रोत अभिलेख
- 2.8
- सहायक विषय
- श्रीराम-सीता-लक्ष्मणका वनगमन और नगर-निवासियोंको सोये छोड़कर आगे बढ़ना
- मुद्रित पृष्ठ
- 409, 410
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।