अयोध्याकाण्ड · दोहा 168 · दोहा/सोरठा
मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।
मूल पाठ
मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।
कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।।
स्रोत अभिलेख 2.168 · पुस्तक पृ. 482, 483
भावार्थ
मूल पाठ के बादमाता कौसल्याजी भरतजीके स्वाभाविक ही सच्चे और सरल वचनोंको सुनकर कहने लगीं— हे तात! तुम तो मन, वचन और शरीरसे सदा ही श्रीरामचन्द्रके प्यारे हो॥ १६८॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 483 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।
English explanation
Hearing Bharata's truthful words, spoken with natural sincerity, mother Kaushalya—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मातु | माता कौसल्या | mother Kaushalya |
| भरत | भरत, राम के भाई | Bharata, Rama's brother |
| के | के | of |
| बचन | वचन | words |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| साँचे | सच्चे | truthful |
| सरल | सरल; निष्कपट | sincere; guileless |
| सुभायँ | स्वभाव से; सहज भाव में | in disposition; naturally |
2 कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।।
English explanation
Says, ‘My son, you are always dear to Rama in word, thought, and deed.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहति | कहती हैं | says |
| राम | राम को; राम के लिए | to Rama |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| तात | हे बेटा | my son |
| तुम्ह | तुम | you |
| सदा | सदैव | always |
| बचन | वचन से | in speech |
| मन | मन से | in thought |
| कायँ | शरीर से; कर्म से | in body; in deed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 168
- स्रोत अभिलेख
- 2.168
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 483
- सहायक विषय
- भरत-कौसल्या-संवाद और दशरथजीकी अन्त्येष्टि क्रिया
- मुद्रित पृष्ठ
- 482, 483
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