अयोध्याकाण्ड · दोहा 27 · दोहा/सोरठा
मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।
मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।
देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।27।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.27 · पुस्तक पृ. 366, 366
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।
प्रिय, तुम केवल ‘माँगो, माँगो’ कहते हो; कभी न देते हो, न लेते हो।
English explanation
Beloved, you merely say, ‘Ask, ask’; you never give or take.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मागु | माँगो | ask |
| मागु | माँगो | ask |
| पै | केवल | only; merely |
| कहहु | तुम कहते हो | you say |
| पिय | हे प्रिय | O beloved |
| कबहुँ | कभी | ever |
| न | नहीं | not |
| देहु | तुम देते हो | you give |
| न | नहीं | not |
| लेहु | तुम लेते हो | you take |
2 देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।27।।
तुमने दो वरदान देने को कहा था; वे भी मिलेंगे या नहीं, इसमें संदेह है।
English explanation
You promised to grant two boons; I doubt whether I shall receive even those.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देन | देने को | to give |
| कहेहु | तुमने कहा था | you had said; promised |
| बरदान | वरदान | boons |
| दुइ | दो | two |
| तेउ | वे भी | even those |
| पावत | मिलने में | about receiving |
| संदेहु | संदेह है | there is doubt |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 27
- स्रोत अभिलेख
- 2.27
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 366, 366
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।