अयोध्याकाण्ड · दोहा 260 · दोहा/सोरठा
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.26 · पुस्तक पृ. 560, 561
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।
मैं भी स्नेह और संकोच के वश होकर उनके सामने अपनी बात नहीं कह सका।
English explanation
I too, constrained by affection and reserve, did not speak my mind in his presence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| महूँ | मैं भी | I too |
| सनेह | स्नेह | affection |
| सकोच | संकोच | reserve; hesitation |
| बस | के वश में | under the sway of |
| सनमुख | सामने; उपस्थित होकर | in his presence |
| कही | कही; व्यक्त की | spoke; expressed |
| न | नहीं | not |
| बैन | बात; वचन | words; what I wished to say |
2 दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।
प्रेम के प्यासे मेरे नेत्र आज तक उनके दर्शन से तृप्त नहीं हुए।
English explanation
My eyes, thirsty with love, have not yet been satisfied by beholding him.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दरसन | दर्शन से | by beholding him |
| तृपित | तृप्त; संतुष्ट | satisfied |
| न | नहीं | not |
| आजु | आज | today |
| लगि | तक | until; up to |
| पेम | प्रेम के | with love |
| पिआसे | प्यासे | thirsty; yearning |
| नैन | नेत्र | eyes |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 260
- स्रोत अभिलेख
- 2.26
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 560, 561
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।