अयोध्याकाण्ड · दोहा 259 · दोहा/सोरठा
तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।
तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।
कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।259।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.259 · पुस्तक पृ. 559, 560
भावार्थ और शब्दार्थ
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1तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।
तब मुनि वसिष्ठ भरत से बोले: बेटा, सब संकोच छोड़कर,
English explanation
Then the sage Vashishtha said to Bharata: Dear son, setting aside all hesitation,
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| मुनि | मुनि वसिष्ठ | the sage Vashishtha |
| बोले | बोले | said |
| भरत | भरत | Bharata |
| सन | से | to |
| सब | सारा | all |
| सँकोचु | संकोच | hesitation |
| तजि | छोड़कर | setting aside |
| तात | हे बेटा | dear son |
2 कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।259।।
कृपा के सागर अपने प्रिय भाई राम से अपने हृदय की बात कहो।
English explanation
Tell your beloved brother Rama, the ocean of compassion, what is in your heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कृपासिंधु | कृपा के सागर राम | Rama, the ocean of compassion |
| प्रिय | प्रिय | beloved |
| बंधु | भाई | brother |
| सन | से | to |
| कहहु | कहो | tell |
| हृदय | अपने हृदय | your heart |
| कै | की | of |
| बात | बात | what is within |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 259
- स्रोत अभिलेख
- 2.259
- सहायक विषय
- श्रीवसिष्ठजीका भाषण
- मुद्रित पृष्ठ
- 559, 560
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