अयोध्याकाण्ड · दोहा 45 · दोहा/सोरठा
मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।
मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।
आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.45 · पुस्तक पृ. 381, 381
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।
पिताजी, इस मंगलमय समय में स्नेह के कारण होने वाला शोक छोड़ दीजिए।
English explanation
Father, at this auspicious time, put aside the sorrow arising from your affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मंगल | मंगलमय; शुभ | auspicious |
| समय | समय में | at this time |
| सनेह | स्नेह के | of affection |
| बस | वश में; प्रभाव से | under the sway; through the influence |
| सोच | शोक; चिंता | sorrow; anxiety |
| परिहरिअ | त्याग दीजिए | please put aside |
| तात | पिताजी | Father |
2 आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।
हृदय में प्रसन्न होकर मुझे आज्ञा दीजिए। यह कहते हुए प्रभु राम का शरीर रोमांचित हो गया।
English explanation
Please grant me permission with joy in your heart. As Lord Rama said this, his body thrilled with goosebumps.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आयसु | आज्ञा; अनुमति | permission; command |
| देइअ | दीजिए | please give |
| हरषि | प्रसन्न होकर | rejoicing |
| हियँ | हृदय में | in your heart |
| कहि | कहकर; कहते हुए | having said; while saying |
| पुलके | रोमांचित हो गए | thrilled with goosebumps |
| प्रभु | प्रभु राम के | of Lord Rama |
| गात | अंग; शरीर | limbs; body |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 45
- स्रोत अभिलेख
- 2.45
- सहायक विषय
- श्रीराम-दशरथ-संवाद, अवध-वासियोंका विषाद, कैकेयीको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 381, 381
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