अयोध्याकाण्ड · दोहा 44 · दोहा/सोरठा
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।
बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.44 · पुस्तक पृ. 380, 380
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।
आप सबके हृदय में प्रेरणा देने वाले हैं; राम को ऐसी बुद्धि दीजिए—
English explanation
You inspire everyone’s heart; grant Rama such a disposition—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | आप | you |
| प्रेरक | प्रेरणा देने वाले | the inspirer |
| सब | सभी | everyone |
| के | के | of |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| सो | ऐसी; वह | such |
| मति | बुद्धि; मनोभाव | understanding; disposition |
| रामहि | राम को | to Rama |
| देहु | दीजिए | grant |
2 बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।
कि वे मेरे वचन को छोड़कर, शील और स्नेह को त्यागकर घर में रहें।
English explanation
That he may disregard my word and remain at home, setting aside his moral propriety and affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बचनु | वचन; आज्ञा | word; command |
| मोर | मेरा | my |
| तजि | त्यागकर; न मानकर | disregarding |
| रहहि | रहें | may remain |
| घर | घर में | at home |
| परिहरि | छोड़कर | setting aside |
| सीलु | शील; मर्यादापूर्ण आचरण | moral propriety |
| सनेहु | स्नेह; प्रेम | affection |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 44
- स्रोत अभिलेख
- 2.44
- सहायक विषय
- श्रीराम-कैकेयी-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 380, 380
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