अयोध्याकाण्ड · दोहा 93 · दोहा/सोरठा
भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।
भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।
करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल।।93।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.93 · पुस्तक पृ. 420, 421
भावार्थ और शब्दार्थ
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1भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।
भक्तों, पृथ्वी, ब्राह्मणों, गायों और देवताओं के हित के लिए कृपालु राम—
English explanation
For the welfare of devotees, the earth, Brahmins, cows, and gods, compassionate Rama—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भगत | भक्तों के | of devotees |
| भूमि | पृथ्वी के | of the earth |
| भूसुर | ब्राह्मणों के | of Brahmins |
| सुरभि | गायों के | of cows |
| सुर | देवताओं के | of the gods |
| हित | हित; कल्याण | welfare |
| लागि | के लिए | for the sake of |
| कृपाल | कृपालु राम | compassionate Rama |
2 करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल।।93।।
मनुष्य का शरीर धारण करके चरित्र करते हैं; उन्हें सुनने से संसार के बंधन मिट जाते हैं।
English explanation
He assumes a human body and performs deeds; hearing of them dissolves worldly entanglements.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करत | करते हैं | performs |
| चरित | चरित्र; कर्म | deeds |
| धरि | धारण करके | having assumed |
| मनुज | मनुष्य का | human |
| तनु | शरीर | body |
| सुनत | सुनने से | upon hearing |
| मिटहि | मिट जाते हैं | are dissolved |
| जग | संसार के | of worldly existence |
| जाल | जाल; बंधन | entanglements; bonds |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 93
- स्रोत अभिलेख
- 2.93
- सहायक विषय
- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना
- मुद्रित पृष्ठ
- 420, 421
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