अयोध्याकाण्ड · दोहा 190 · दोहा/सोरठा
बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।
बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।
सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।190।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.19 · पुस्तक पृ. 500, 501
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।
शोक से मुक्त निषादराज ने सबका उत्साह बढ़ाया।
English explanation
Free of sorrow, the Nishada chief encouraged everyone.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिगत | दूर हुआ | departed; gone |
| बिषाद | शोक | sorrow |
| निषादपति | निषादराज गुह | Guha, chief of the Nishadas |
| सबहि | सबका | everyone’s |
| बढ़ाइ | बढ़ाकर | having increased |
| उछाहु | उत्साह | enthusiasm; courage |
2 सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।190।।
राम का स्मरण करके उन्होंने तुरंत तरकस, धनुष और कवच माँगा।
English explanation
Remembering Rama, he immediately asked for a quiver, a bow, and armor.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुमिरि | स्मरण करके | having remembered |
| राम | राम को | Rama |
| मागेउ | माँगा | asked for |
| तुरत | तुरंत | immediately |
| तरकस | बाण रखने का तरकस | a quiver for arrows |
| धनुष | धनुष | a bow |
| सनाहु | कवच | armor |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 190
- स्रोत अभिलेख
- 2.19
- सहायक विषय
- निषादकी शङ्का और सावधानी
- मुद्रित पृष्ठ
- 500, 501
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