अयोध्याकाण्ड · दोहा 269 · दोहा/सोरठा
प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।
प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।269।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.269 · पुस्तक पृ. 567, 568
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।
प्रभु प्रसन्न मन से, संकोच छोड़कर, जिसको जो आज्ञा देंगे—
English explanation
Whatever command the Lord gives to each person, with a glad heart and without hesitation—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | प्रभु | the Lord |
| प्रसन्न | प्रसन्न | glad |
| मन | मन से | with a heart |
| सकुच | संकोच | hesitation |
| तजि | त्यागकर | setting aside |
| जो | जो भी | whatever |
| जेहि | जिसको | to whomever |
| आयसु | आज्ञा | command |
| देब | देंगे | will give |
2 सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।269।।
सब उस आज्ञा को आदरपूर्वक सिर पर धारण करके पालन करेंगे; अनर्थ और उलझनें मिट जाएँगी।
English explanation
Everyone will reverently accept and carry out that command; troubles and complications will disappear.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | उस आज्ञा को | that command |
| सिर | सिर पर | upon the head |
| धरि | धारण करके | accepting reverently |
| धरि | धारण करके | accepting reverently |
| करिहि | पालन करेंगे | will carry out |
| सबु | सब लोग | everyone |
| मिटिहि | मिट जाएँगे | will disappear |
| अनट | अनर्थ; संकट | troubles; harmful difficulties |
| अवरेब | उलझनें; प्रपंच | complications; entanglements |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 269
- स्रोत अभिलेख
- 2.269
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 567, 568
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