अयोध्याकाण्ड · दोहा 167 · दोहा/सोरठा
जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।
जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।
तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.167 · पुस्तक पृ. 482, 482
भावार्थ और शब्दार्थ
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1जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।
जो विष्णु और शिव के चरणों को छोड़कर भयानक भूतगणों की उपासना करते हैं—
English explanation
Those who abandon the feet of Vishnu and Shiva and worship fearsome spirits—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जे | जो लोग | those who |
| परिहरि | त्यागकर | abandoning |
| हरि | विष्णु के | of Vishnu |
| हर | शिव के | of Shiva |
| चरन | चरण | feet |
| भजहिं | उपासना करते हैं | worship |
| भूतगन | भूतों के समूहों की | hosts of spirits |
| घोर | भयानक | fearsome |
2 तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।।
हे विधाता, मुझे उन्हीं की गति दो, यदि हे जननी, इसमें मेरी सहमति रही हो।
English explanation
O Creator, give me their fate if, Mother, this had my consent.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तेहि | उसी की | of such a person |
| कइ | की | of |
| गति | गति, परिणति | fate |
| मोहि | मुझे | to me |
| देउ | दो | grant |
| बिधि | हे विधाता | O Creator |
| जौं | यदि | if |
| जननी | हे माता | O Mother |
| मत | सहमति | consent |
| मोर | मेरी | my |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 167
- स्रोत अभिलेख
- 2.167
- सहायक विषय
- भरत-कौसल्या-संवाद और दशरथजीकी अन्त्येष्टि क्रिया
- मुद्रित पृष्ठ
- 482, 482
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