अयोध्याकाण्ड · दोहा 198 · दोहा/सोरठा
जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।
जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।
अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।198।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.198 · पुस्तक पृ. 507, 508
भावार्थ और शब्दार्थ
1जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।
एआई अर्थ-मसौदा: जहाँ पवित्र शीशम के पेड़ के नीचे रघुकुल-श्रेष्ठ राम ने विश्राम किया था।
English explanation
AI draft interpretation: Where Rama, foremost of Raghu’s lineage, had rested beneath the sacred shisham tree.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जहँ | जहाँ | where |
| सिंसुपा | शीशम का पेड़ | shisham tree |
| पुनीत | पवित्र | sacred |
| तर | के नीचे | beneath |
| रघुबर | रघुकुल में श्रेष्ठ राम | Rama, foremost of Raghu’s lineage |
| किय | किया | had taken |
| बिश्रामु | विश्राम | rest |
2 अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।198।।
एआई अर्थ-मसौदा: भरत ने अत्यंत स्नेह और आदर से वहाँ दंडवत प्रणाम किया।
English explanation
AI draft interpretation: With deep affection and reverence, Bharata prostrated himself there.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अति | अत्यंत | very deeply |
| सनेहँ | स्नेह से | with affection |
| सादर | आदरपूर्वक | reverently |
| भरत | भरत ने | Bharata |
| कीन्हेउ | किया | performed |
| दंड | दंडवत; शरीर सीधा भूमि पर डालकर | prostrate, with the body stretched on the ground |
| प्रनामु | प्रणाम | obeisance |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 198
- स्रोत अभिलेख
- 2.198
- सहायक विषय
- भरत-निषाद-मिलन और संवाद एवं भरतजीका तथा नगरवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 507, 508
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।