अयोध्याकाण्ड · दोहा 77 · दोहा/सोरठा
औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।
औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.77 · पुस्तक पृ. 407, 407
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।
अपराध कोई और करता है, पर उसके फल का भोग किसी दूसरे को मिलता है।
English explanation
One person commits the offense, yet another receives its consequences to endure.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| औरु | कोई दूसरा | one person |
| करै | करता है | commits |
| अपराधु | अपराध | offense |
| कोउ | कोई | someone |
| और | दूसरा | else |
| पाव | पाता है | receives |
| फल | फल | consequences |
| भोगु | भोगने के लिए | to endure |
2 अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।।
भगवान की गति अत्यंत विचित्र है; संसार में कौन उसे जान सकने योग्य है?
English explanation
The ways of God are exceedingly wondrous; who in the world is capable of understanding them?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| बिचित्र | विचित्र | wondrous and inscrutable |
| भगवंत | भगवान की | of God |
| गति | कार्य-प्रणाली | ways |
| को | कौन | who |
| जग | संसार में | in the world |
| जानै | जानने | to understand |
| जोगु | योग्य है | is capable |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 77
- स्रोत अभिलेख
- 2.77
- सहायक विषय
- श्रीरामजी, लक्ष्मणजी, सीताजीका महाराज दशरथके पास विदा माँगने जाना, दशरथजीका सीताजीको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 407, 407
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