अयोध्याकाण्ड · दोहा 280 · दोहा/सोरठा
एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।।
एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।।
सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.28 · पुस्तक पृ. 577, 578
भावार्थ और शब्दार्थ
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1एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।।
सब लोग कहते हैं, ‘हम इस सुख के योग्य नहीं हैं; ऐसा भाग्य हमारे पास कहाँ है?’
English explanation
Everyone says, ‘We are not worthy of this happiness; how could we have such good fortune?’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एहि | इस | this |
| सुख | सुख के | happiness |
| जोग | योग्य | worthy of |
| न | नहीं | not |
| लोग | लोग | people |
| सब | सब | all |
| कहहिं | कहते हैं | say |
| कहाँ | कहाँ है | where is |
| अस | ऐसा | such |
| भागु | सौभाग्य | good fortune |
2 सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।
दोनों समाजों में स्वाभाविक रूप से राम के चरणों के प्रति प्रेम था।
English explanation
Both gatherings had a natural love for Rama’s feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सहज | स्वाभाविक | innate |
| सुभायँ | स्वभाव से | by nature |
| समाज | समाजों में | in the gatherings |
| दुहु | दोनों | both |
| राम | राम के | Rama’s |
| चरन | चरणों के प्रति | toward the feet |
| अनुरागु | प्रेम | loving attachment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 280
- स्रोत अभिलेख
- 2.28
- सहायक विषय
- जनकजीका पहुँचना, कोल-किरातादिकी भेंट, सबका परस्पर मिलाप
- मुद्रित पृष्ठ
- 577, 578
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।