अयोध्याकाण्ड · दोहा 120 · दोहा/सोरठा
एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।
एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।
किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।120।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.12 · पुस्तक पृ. 443, 444
भावार्थ और शब्दार्थ
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1एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।
इस प्रकार बार-बार स्नेहभरे वचन कहते हुए वे अपनी आँखें आँसुओं से भर लेते हैं।
English explanation
Speaking affectionate words repeatedly in this way, they fill their eyes with tears.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एहि | इस | this |
| बिधि | प्रकार | manner |
| कहि | कहते | saying |
| कहि | बार-बार कहते | saying repeatedly |
| बचन | वचन | words |
| प्रिय | स्नेहभरे | affectionate |
| लेहिं | लेते हैं | do; bring about |
| नयन | आँखें | eyes |
| भरि | भरकर | filling |
| नीर | जल; आँसू | water; tears |
2 किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।120।।
इतने कोमल शरीर वाले ये दुर्गम मार्ग पर कैसे चलेंगे?
English explanation
How will they travel along this difficult path with bodies so delicate?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| किमि | कैसे | how |
| चलिहहि | चलेंगे | will walk; will travel |
| मारग | मार्ग पर | along the path |
| अगम | दुर्गम | hard to traverse |
| सुठि | अत्यंत | very |
| सुकुमार | कोमल | delicate |
| सरीर | शरीर | bodies |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 120
- स्रोत अभिलेख
- 2.12
- सहायक विषय
- यमुनाको प्रणाम, वनवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 443, 444
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