अयोध्याकाण्ड · दोहा 174 · दोहा/सोरठा
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।174।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.174 · पुस्तक पृ. 487, 488
भावार्थ और शब्दार्थ
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1अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।
जो उचित-अनुचित का विचार छोड़कर पिता के वचनों का पालन करते हैं—
English explanation
Those who set aside consideration of right and wrong and obey their father’s words—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अनुचित | अनुचित; गलत | improper; wrong |
| उचित | उचित; सही | proper; right |
| बिचारु | विचार; विवेचना | consideration; deliberation |
| तजि | छोड़कर | setting aside |
| जे | जो लोग | those who |
| पालहिं | पालन करते हैं | obey; fulfill |
| पितु | पिता के | their father’s |
| बैन | वचन | words; commands |
2 ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।174।।
वे सुख और सुयश के पात्र होते हैं और देवराज इंद्र के निवास में बसते हैं।
English explanation
They become worthy of happiness and good renown, and dwell in the abode of Indra, king of the gods.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ते | वे लोग | they; those people |
| भाजन | पात्र; योग्य प्राप्तकर्ता | worthy recipients |
| सुख | सुख | happiness |
| सुजस | सुयश; अच्छी कीर्ति | good renown |
| के | के | of |
| बसहिं | निवास करते हैं | dwell |
| अमरपति | देवताओं के राजा इंद्र के | of Indra, king of the gods |
| ऐन | निवास; भवन में | in the abode |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 174
- स्रोत अभिलेख
- 2.174
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 487, 488
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