अयोध्याकाण्ड · दोहा 117 · दोहा/सोरठा
अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।
अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।
सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।117।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.117 · पुस्तक पृ. 440, 441
भावार्थ और शब्दार्थ
1अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।
अत्यंत प्रेमपूर्वक सीता के चरणों में पड़कर वे अनेक प्रकार के आशीर्वाद देती हैं।
English explanation
Bowing at Sita’s feet with deep affection, they offer her blessings of many kinds.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अति | अत्यंत | very deeply |
| सप्रेम | प्रेमपूर्वक | with affection |
| सिय | सीता के | Sita’s |
| पायँ | चरणों में | at the feet |
| परि | पड़कर | having bowed down |
| बहुबिधि | अनेक प्रकार से | in many ways |
| देहिं | देती हैं | give |
| असीस | आशीर्वाद | blessings |
2 सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।117।।
जब तक पृथ्वी शेषनाग के सिर पर रहे, तब तक तुम सदा सुहागिनी रहो।
English explanation
May you remain blessed with a living husband for as long as the earth rests upon the serpent Shesha’s head.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सदा | सदा | always |
| सोहागिनि | पति के जीवित रहते सुहाग से संपन्न | blessed with a living husband |
| होहु | रहो | may you remain |
| तुम्ह | तुम | you |
| जब | जब | as |
| लगि | तक | long as |
| महि | पृथ्वी | the earth |
| अहि | शेषनाग के | of the serpent Shesha |
| सीस | सिर पर | upon the head |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 117
- स्रोत अभिलेख
- 2.117
- सहायक विषय
- यमुनाको प्रणाम, वनवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 440, 441
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।