अयोध्याकाण्ड · छंद · छंद
सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए।
मूल पाठ
सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए।
लोचन सरोरुह स्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए॥
सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।
तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की॥
स्रोत अभिलेख 2.176 · पुस्तक पृ. 489, 489
भावार्थ
मूल पाठ के बादसरलताके रसमें सनी हुई माताकी वाणी सुनकर भरतजी व्याकुल हो गये। उनके नेत्र-कमल जल (आँसू) बहाकर हृदयके विरहरूपी नवीन अंकुरको सींचने लगे। (नेत्रोंके आँसुओंने उनके वियोग-दु:खको बहुत ही बढ़ाकर उन्हें अत्यन्त व्याकुल कर दिया।) उनकी वह दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीरकी सुध भूल गयी। तुलसीदासजी कहते हैं—स्वाभाविक प्रेमकी सीमा श्रीभरतजीकी सब लोग आदरपूर्वक सराहना करने लगे।
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 489 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए।
English explanation
AI-generated draft interpretation: Hearing his mother's words steeped in the sweetness of sincerity, Bharata became distraught.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सानी | सनी हुई | steeped in |
| सरल | सरल, निष्कपट | sincere, guileless |
| रस | भाव का रस | emotional sweetness |
| मातु | माता की | of his mother |
| बानी | वाणी | words |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| भरतु | भरत, राम के भाई | Bharata, Rama's brother |
| ब्याकुल | व्याकुल | distraught |
| भए | हो गए | became |
2लोचन सरोरुह स्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए॥
English explanation
Tears flowed from his lotus-like eyes, watering fresh shoots of separation's sorrow in his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लोचन | नेत्र | eyes |
| सरोरुह | कमल | lotuses |
| स्रवत | आँसू बहाते हुए | shedding tears |
| सींचत | सींचते हुए | watering |
| बिरह | विरह के | of separation's sorrow |
| उर | हृदय में | in the heart |
| अंकुर | अंकुरों को | shoots |
| नए | नए | new |
3सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।
English explanation
Seeing Bharata in that state at that moment, everyone lost awareness of their own bodies.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह | that |
| दसा | दशा | state |
| देखत | देखकर | on seeing |
| समय | समय | time |
| तेहि | उस | that |
| बिसरी | भूल गई | was forgotten |
| सबहि | सभी को | by everyone |
| सुधि | सुध, चेतना | awareness |
| देह | देह | the body |
| की | की | of |
4तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की॥
English explanation
Tulsidas says that everyone respectfully praised Bharata as the utmost expression of natural affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुलसी | कवि तुलसीदास | the poet Tulsidas |
| सराहत | सराहते हैं | praise |
| सकल | सभी | everyone |
| सादर | आदरपूर्वक | respectfully |
| सीवँ | पराकाष्ठा, अंतिम सीमा | the utmost extent |
| सहज | स्वाभाविक | natural |
| सनेह | स्नेह | affection |
| की | की | of |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 2.176
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 489
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 489, 489
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।