अयोध्याकाण्ड · छंद · छंद
उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे तात! मेरा यही उपदेश है (अर्थात् तुम वही करना) जिससे वनमें तुम्हारे कारण श्रीरामजी और सीताजी सुख पावें और पिता, माता, प्रिय परिवार तथा नगरके सुखोंकी याद भूल जायँ। तुलसीदासजी कहते हैं कि सुमित्राजीने इस प्रकार हमारे प्रभु (श्रीलक्ष्मणजी) को शिक्षा देकर [वन जानेकी] आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्रीसीताजी और श्रीरघुवीरजीके चरणोंमें तुम्हारा निर्मल (निष्काम और अनन्य) एवं प्रगाढ़ प्रेम नित-नित नया हो!
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 406 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।
पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।।
तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।
रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।
स्रोत अभिलेख 2.75 · पुस्तक पृ. 405, 406
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।
English explanation
Dear son, this is the counsel: through your service, may Rama and Sita find comfort.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उपदेसु | उपदेश | counsel |
| यहु | यह | this |
| जेहिं | जिससे | whereby |
| तात | बेटा | dear son |
| तुम्हरे | तुम्हारे द्वारा | through you |
| राम | श्रीराम | Rama |
| सिय | सीता | Sita |
| सुख | सुख | comfort |
| पावहीं | पाएँ | may obtain |
2 पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।।
English explanation
And in the forest, help them forget the remembrance of their father, mother, dear family, and the comforts of the city.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पितु | पिता | father |
| मातु | माता | mother |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| परिवार | परिवार | family |
| पुर | नगर के | of the city |
| सुख | सुखों की | comforts |
| सुरति | स्मृति | remembrance |
| बन | वन में | in the forest |
| बिसरावहीं | भुला दो | help them forget |
3 तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।
English explanation
Tulsidas says: after instructing Lord Lakshmana, his mother gave him permission to leave and then blessed him.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुलसी | कवि तुलसीदास कहते हैं | the poet Tulsidas says |
| प्रभुहि | प्रभु लक्ष्मण को | to Lord Lakshmana |
| सिख | सीख | instruction |
| देइ | देकर | having given |
| आयसु | अनुमति | permission |
| दीन्ह | दी | gave |
| पुनि | फिर | then |
| आसिष | आशीर्वाद | a blessing |
| दई | दिया | gave |
4 रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।
English explanation
May your love for the feet of Sita and Rama remain unbroken, pure, and ever renewed each day.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रति | प्रेम | love |
| होउ | हो; बना रहे | may it be; may it remain |
| अबिरल | अखंड | uninterrupted |
| अमल | निर्मल | pure |
| सिय | सीता | Sita |
| रघुबीर | रघुकुल के वीर राम | Rama, hero of Raghu’s lineage |
| पद | चरणों में | for the feet of |
| नित | नित्य | each day |
| नित | नित्य | continually |
| नई | नया | fresh; renewed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 2.75
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 406
- सहायक विषय
- श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 405, 406
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।