अयोध्याकाण्ड · छंद · छंद
अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दशोकसमुद्रमें डुबकी लगाते हुए सभी स्त्री-पुरुष महान् व्याकुल होकर सोच (चिन्ता) कर रहे हैं। वे सब विधाताको दोष देते हुए क्रोधयुक्त होकर कह रहे हैं कि प्रतिकूल विधाताने यह क्या किया? तुलसीदासजी कहते हैं कि देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनिगणोंमें कोई भी समर्थ नहीं है जो उस समय विदेह (जनकराज) की दशा देखकर प्रेमकी नदीको पार कर सके (प्रेममें मग्र हुए बिना रह सके)।
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 574 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा।
दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा॥
सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की।
तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की॥
स्रोत अभिलेख 2.276 · पुस्तक पृ. 573, 574
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा।
English explanation
AI-generated draft meaning: Immersed in an ocean of grief, the women and men brood in great distress.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अवगाहि | डूबकर | having plunged into |
| सोक | शोक के | of grief |
| समुद्र | समुद्र में | the ocean |
| सोचहिं | चिंता करते हैं | brood anxiously |
| नारि | स्त्रियाँ | women |
| नर | पुरुष | men |
| ब्याकुल | व्याकुल | distressed |
| महा | अत्यंत | greatly |
2दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा॥
English explanation
Everyone angrily lays blame, saying, “What has adverse fate done!”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दै | देकर | giving; assigning |
| दोष | दोष | blame |
| सकल | सब लोग | everyone |
| सरोष | रोष सहित | with anger |
| बोलहिं | कहते हैं | say |
| बाम | प्रतिकूल | adverse |
| बिधि | विधाता | the ordainer of fate |
| कीन्हो | कर दिया | has done |
| कहा | क्या | what |
3सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की।
English explanation
The gods, perfected beings, ascetics, yogis, and sages, seeing King Janaka’s condition—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुर | देवता | gods |
| सिद्ध | सिद्ध पुरुष | spiritually accomplished beings |
| तापस | तपस्वी | ascetics |
| जोगिजन | योग साधना करने वाले | practitioners of yoga |
| मुनि | मुनि | sages |
| देखि | देखकर | having seen |
| दसा | दशा | condition |
| बिदेह | विदेह राजा जनक | Janaka, king of Videha |
| की | की | of |
4तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की॥
English explanation
Tulsidas says: None is capable of crossing the river of affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुलसी | कवि तुलसीदास कहते हैं | the poet Tulsidas says |
| न | नहीं | not |
| समरथु | सक्षम | capable |
| कोउ | कोई | anyone |
| जो | जो | who |
| तरि | पार कर | cross |
| सकै | सके | can |
| सरित | नदी | river |
| सनेह | स्नेह | affection |
| की | की | of |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 2.276
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 574
- सहायक विषय
- जनकजीका पहुँचना, कोल-किरातादिकी भेंट, सबका परस्पर मिलाप
- मुद्रित पृष्ठ
- 573, 574
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।