अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दमेरा कल्याण तो सीतापति श्रीरामजीकी चाकरीमें है, सो उसे माताकी कुटिलताने छीन लिया। मैंने अपने मनमें अनुमान करके देख लिया है कि दूसरे किसी उपायसे मेरा कल्याण नहीं है॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 491 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।
मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.178 · पुस्तक पृ. 491, 491
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।
English explanation
My welfare lies in serving Rama, Sita’s husband; my mother’s crookedness has taken that away.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हित | हित; कल्याण | welfare; true good |
| हमार | मेरा | my |
| सियपति | सीता के पति राम की | of Rama, Sita’s husband |
| सेवकाई | सेवा | service |
| सो | वह सेवा | that service |
| हरि | हरकर; छीनकर | taking away |
| लीन्ह | ले ली | took |
| मातु | माता की | of my mother |
| कुटिलाई | कुटिलता ने | crookedness |
2 मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं।।
English explanation
Having considered it in my mind, I see no other means to my welfare.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मैं | मैंने | I |
| अनुमानि | विचार करके | having considered |
| दीख | देखा; समझा | saw; discerned |
| मन | मन | mind |
| माहीं | में | within |
| आन | अन्य | other |
| उपायँ | उपाय से | by a means |
| मोर | मेरा | my |
| हित | हित; कल्याण | welfare |
| नाहीं | नहीं है | is not |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.178
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 491
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 491, 491
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