अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए।
मूल पाठ
हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए।
जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।।
स्रोत अभिलेख 2.73 · पुस्तक पृ. 403, 404
भावार्थ
मूल पाठ के बादवे हॢषत हृदयसे माता सुमित्राजीके पास आये, मानो अंधा फिरसे नेत्र पा गया हो। उन्होंने जाकर माताके चरणोंमें मस्तक नवाया। किन्तु उनका मन रघुकुलको आनन्द देनेवाले श्रीरामजी और जानकीजीके साथ था॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 404 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए।
English explanation
Lakshmana came to his mother with a joyful heart, as though a blind person had regained his eyes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हरषित | प्रसन्न | joyful |
| ह्दयँ | हृदय से; हृदय में | in heart |
| मातु | माता सुमित्रा के | his mother Sumitra |
| पहिं | पास | to; near |
| आए | आए | came |
| मनहुँ | मानो | as though |
| अंध | अंधा व्यक्ति | a blind person |
| फिरि | फिर से | again |
| लोचन | आँखें | eyes |
| पाए | पा गया हो | had regained |
2 जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।।
English explanation
He went and bowed his head at his mother’s feet, while his mind remained with Rama and Janaki.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जाइ | जाकर | having gone |
| जननि | माता के | his mother’s |
| पग | चरणों पर | at the feet |
| नायउ | झुकाया | bowed |
| माथा | माथा | head |
| मनु | मन | mind |
| रघुनंदन | रघुवंश के आनंद राम | Rama, joy of Raghu’s lineage |
| जानकि | जानकी; जनक की पुत्री सीता | Janaki, Sita, daughter of Janaka |
| साथा | के साथ था | was with |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.73
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 404
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 403, 404
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।