अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता।।
मूल पाठ
सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता।।
अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई।।
स्रोत अभिलेख 2.184 · पुस्तक पृ. 495, 496
भावार्थ
मूल पाठ के बादवह दुष्ट करोड़ों पुरखोंसहित सौ कल्पोंतक नरकके घरमें निवास करेगा। साँपके पाप और अवगुणको मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विषको हर लेती है और दु:ख तथा दरिद्रताको भस्म कर देती है॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 496 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता।।
English explanation
That fool, together with countless generations of his lineage, will dwell in hell for a hundred cosmic ages.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह | that person |
| सठु | मूर्ख | fool |
| कोटिक | करोड़ों | crores of; countless |
| पुरुष | वंश की पीढ़ियाँ | generations of his lineage |
| समेता | सहित | together with |
| बसिहि | रहेगा | will dwell |
| कलप | कल्पों तक | for cosmic ages |
| सत | सौ | a hundred |
| नरक | नरक के | of hell |
| निकेता | निवास में | in the abode |
2 अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई।।
English explanation
A serpent’s jewel does not take on the serpent’s sins or faults; it removes poison and destroys suffering and poverty.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अहि | सर्प के | the serpent’s |
| अघ | पाप | sins |
| अवगुन | दोष | faults |
| नहि | नहीं | not |
| मनि | मणि | the jewel |
| गहई | ग्रहण करती | takes on |
| हरइ | हरती है | removes |
| गरल | विष | poison |
| दुख | दुःख | suffering |
| दारिद | दरिद्रता | poverty |
| दहई | जला डालती; नष्ट करती है | burns away; destroys |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.184
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 496
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 495, 496
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।