अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना।।
मूल पाठ
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना।।
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।।
स्रोत अभिलेख 2.172 · पुस्तक पृ. 486, 486
भावार्थ
मूल पाठ के बादसोच उस ब्राह्मणका करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय- भोगमें ही लीन रहता है। उस राजाका सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणोंके समान प्यारी नहीं है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 486 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना।।
English explanation
One should lament the Brahmin who lacks knowledge of the Vedas and, abandoning his own duties, is absorbed in sensual pleasures.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोचिअ | शोक करना चाहिए | one should lament |
| बिप्र | ब्राह्मण | a Brahmin |
| जो | जो | who |
| बेद | वेदज्ञान | knowledge of the Vedas |
| बिहीना | से रहित | devoid of |
| तजि | छोड़कर | having abandoned |
| निज | अपना | his own |
| धरमु | धर्म और कर्तव्य | religious duties |
| बिषय | विषय-भोगों में | in sensual pleasures |
| लयलीना | पूरी तरह लीन | wholly absorbed |
2 सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।।
English explanation
One should lament the king who does not understand proper governance and does not love his subjects as dearly as his own life.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोचिअ | शोक करना चाहिए | one should lament |
| नृपति | राजा | the king |
| जो | जो | who |
| नीति | शासन की नीति | principles of governance |
| न | नहीं | not |
| जाना | जानता | knows |
| जेहि | जिसे | to whom |
| न | नहीं | not |
| प्रजा | प्रजा | his subjects |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| प्रान | अपने प्राणों के | his own life |
| समाना | समान | as much as |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.172
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 486
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 486, 486
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।