अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।।
मूल पाठ
सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।।
बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.44 · पुस्तक पृ. 380, 380
भावार्थ
मूल पाठ के बादशोकके विशेष वश होनेके कारण राजा कुछ कह नहीं सकते। वे बार-बार श्रीरामचन्द्रजीको हृदयसे लगाते हैं और मनमें ब्रह्माजीको मनाते हैं कि जिससे श्रीरघुनाथजी वनको न जायँ॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 380 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।।
English explanation
Overcome by grief, the king could say nothing; he kept embracing Rama again and again.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोक | शोक से | by grief |
| बिबस | विवश | overcome |
| कछु | कुछ | anything |
| कहै | कहने | to say |
| न | नहीं | not |
| पारा | सक सके | was able |
| हृदयँ | हृदय से | to his breast |
| लगावत | लगाते रहे | kept clasping |
| बारहिं | बार-बार | repeatedly |
| बारा | बार | times |
2 बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।
English explanation
Inwardly, the king appealed to the Creator so that Rama might not go to the forest.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिधिहि | विधाता को | to the Creator |
| मनाव | मनाते; प्रार्थना करते | appealed to |
| राउ | राजा दशरथ | King Dasharatha |
| मन | मन | mind |
| माहीं | के भीतर | within |
| जेहिं | जिससे; इस प्रकार कि | so that |
| रघुनाथ | रघुवंश के स्वामी राम | Rama, lord of Raghu’s lineage |
| न | नहीं | not |
| कानन | वन को | to the forest |
| जाहीं | जाएँ | might go |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.44
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 380
- सहायक विषय
- श्रीराम-कैकेयी-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 380, 380
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