अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।।
मूल पाठ
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।।
तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.42 · पुस्तक पृ. 378, 379
भावार्थ
मूल पाठ के बादजो कल्पवृक्षको छोड़कर रेंड़की सेवा करते हैं और अमृत त्यागकर विष माँग लेते हैं, हे माता! तुम मनमें विचारकर देखो, वे (महामूर्ख)भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 378 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।।
English explanation
Those who abandon the wish-fulfilling tree to tend a castor plant, and forsake nectar to ask for and take poison—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सेवहिं | सेवा करते हैं | tend; serve |
| अरँडु | अरंड के पौधे की | the castor plant |
| कलपतरु | कल्पवृक्ष को | the wish-fulfilling tree |
| त्यागी | त्यागकर | having abandoned |
| परिहरि | छोड़कर | having forsaken |
| अमृत | अमृत को | nectar of immortality |
| लेहिं | लेते हैं | take |
| बिषु | विष | poison |
| मागी | माँगकर | having asked for it |
2 तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।।
English explanation
Even they would not miss such an opportunity once they had it. Mother, consider this in your heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तेउ | वे भी | even they |
| न | नहीं | not |
| पाइ | पाकर | having obtained |
| अस | ऐसा | such |
| समउ | अवसर | an opportunity |
| चुकाहीं | चूकेंगे | will miss it |
| देखु | देखो | see; consider |
| बिचारि | विचार करके | after reflecting |
| मातु | हे माता | O mother |
| मन | मन | the heart |
| माहीं | में | within |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.42
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 378
- सहायक विषय
- श्रीराम-कैकेयी-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 378, 379
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।