अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।
मूल पाठ
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।
जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।
स्रोत अभिलेख 2.42 · पुस्तक पृ. 378, 379
भावार्थ
मूल पाठ के बादऔर प्राणप्रिय भरत राज्य पावेंगे। [इन सभी बातोंको देखकर यह प्रतीत होता है कि] आज विधाता सब प्रकारसे मुझे सम्मुख हैं (मेरे अनुकूल हैं)। यदि ऐसे कामके लिये भी मैं वनको न जाऊँ तो मूर्खोंके समाजमें सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिये॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 378 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।
English explanation
Bharata, dear to me as life itself, will receive the kingdom; today destiny favors me in every way.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | भरत, राम के छोटे भाई | Bharata, Rama’s younger brother |
| प्रानप्रिय | प्राणों के समान प्रिय | dear as life itself |
| पावहिं | प्राप्त करेंगे | will receive |
| राजू | राज्य | the kingdom |
| बिधि | विधाता; भाग्य | the disposer of destiny; fate |
| सब | सभी | every |
| बिधि | प्रकार से | in ways |
| मोहि | मेरे लिए | toward me |
| सनमुख | अनुकूल | favorable |
| आजु | आज | today |
2 जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।
English explanation
If I do not go to the forest even for such a purpose, count me foremost among fools.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जों | यदि | if |
| न | नहीं | not |
| जाउँ | मैं जाऊँ | I go |
| बन | वन में | to the forest |
| ऐसेहु | ऐसे भी | even such |
| काजा | कार्य के लिए | for a purpose |
| प्रथम | सबसे पहले | foremost |
| गनिअ | गिना जाए | let be counted |
| मोहि | मुझे | me |
| मूढ़ | मूर्खों का | of fools |
| समाजा | समुदाय में | among the company |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.42
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 378
- सहायक विषय
- श्रीराम-कैकेयी-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 378, 379
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