अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को।।
मूल पाठ
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को।।
देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।।
स्रोत अभिलेख 2.304 · पुस्तक पृ. 598, 599
भावार्थ
मूल पाठ के बादभरतजीका स्मरण करनेसे जिसको श्रीरामजीका प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम (अभागा) और कौन होगा? दयालु और सुजान श्रीरामजीने सभीकी दशा देखकर और भक्त (भरतजी) के हृदयकी स्थिति जानकर,॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 598 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को।।
English explanation
Who is as perverse as one who does not readily gain love for Rama by remembering Bharata?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुमिरत | स्मरण करने पर | on remembering |
| भरतहि | भरत को | Bharata |
| प्रेमु | प्रेम | love |
| राम | राम | Rama |
| को | का; राम के प्रति | for; directed toward Rama |
| जेहि | जिसे | to whom |
| न | नहीं | not |
| सुलभ | सहज प्राप्त | readily obtainable |
| तेहि | उसके | that person |
| सरिस | समान | like, equal to |
| बाम | प्रतिकूल स्वभाव वाला | perverse, contrary-minded |
| को | कौन | who |
2 देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।।
English explanation
Compassionate and discerning Rama, seeing everyone’s condition and understanding his devotees’ hearts—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखि | देखकर | having seen |
| दयाल | दयालु | compassionate |
| दसा | दशा | condition |
| सबही | सभी | everyone |
| की | की | of |
| राम | राम | Rama |
| सुजान | भलीभाँति समझने वाले | discerning, perceptive |
| जानि | जानकर | having understood |
| जन | सेवकों; भक्तों | servants; devotees |
| जी | मन; हृदय | mind; heart |
| की | की स्थिति | the state of |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.304
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 598
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 598, 599
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