अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दमुनिके वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर—गुरु तथा स्वामीको भरपेट अपने अनुकूल जानकर—सारा बोझ अपने ही ऊपर समझकर भरतजी कुछ कह नहीं सकते। वे विचार करने लगे॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 560 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।
लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।।
स्रोत अभिलेख 2.26 · पुस्तक पृ. 560, 561
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।
English explanation
AI draft: Hearing the sage’s words and understanding Rama’s disposition, Bharata felt satisfied that his teacher and lord were favorably disposed.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| मुनि | मुनि वसिष्ठ के | of the sage Vasishtha |
| बचन | वचन | words |
| राम | राम का | of Rama |
| रुख | रुख; अभिप्राय | disposition; intention |
| पाई | जानकर | having understood |
| गुरु | गुरु वसिष्ठ | Vasishtha, the teacher |
| साहिब | स्वामी राम | Rama, his lord |
| अनुकूल | अनुकूल; सहमत | favorably disposed; agreeable |
| अघाई | तृप्त हुए | felt satisfied |
2 लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।।
English explanation
Seeing the entire burden resting on himself, Bharata cannot say anything and reflects; the reading of ‘छरु’ is uncertain.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लखि | देखकर; समझकर | seeing; realizing |
| अपने | अपने | his own |
| सिर | सिर पर | upon his head |
| सबु | सारा | all; the entire |
| छरु | छल या युक्ति; यहाँ निर्णय का सारा भार अपने ऊपर डालने की युक्ति। | A stratagem; here, the maneuver placing the entire burden of decision on Bharata. |
| भारू | भार; जिम्मेदारी | burden; responsibility |
| कहि | कह | say |
| न | नहीं | not |
| सकहिं | सकते हैं | are able to |
| कछु | कुछ | anything |
| करहिं | करते हैं | engage in |
| बिचारू | विचार | reflection |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.26
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 560
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 560, 561
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।