अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दभरतजी यह सुनकर पुलकितशरीर हो नेत्रोंमें जल भरकर बड़ा भारी धीरज धरकर बोले— हे प्रभो! आप हमारे पिताके समान प्रिय और पूज्य हैं। और कुलगुरु श्रीवसिष्ठजीके समान हितैषी तो माता-पिता भी नहीं हैं॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 588 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।।
प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू।।
स्रोत अभिलेख 2.293 · पुस्तक पृ. 588, 589
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।।
English explanation
AI draft: Hearing this, Bharata’s body thrilled and his eyes filled with tears. Steadying himself with great composure, he spoke.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| तन | शरीर | body |
| पुलकि | पुलकित होकर | thrilling with emotion |
| नयन | आँखें | eyes |
| भरि | भरकर | filling |
| बारी | जल अर्थात आँसू | water, here tears |
| बोले | बोले | spoke |
| भरतु | भरत, राम के भाई | Bharata, Rama’s brother |
| धीर | धैर्य | composure |
| धरि | धारण करके | having maintained |
| भारी | बहुत अधिक | great |
2 प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू।।
English explanation
My lord, you are dear, worthy of reverence, and like a father. Not even mother and father care for one’s welfare as the family preceptor does.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | हे प्रभु | my lord |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| पूज्य | पूजनीय | worthy of reverence |
| पिता | पिता | father |
| सम | के समान | like |
| आपू | आप | you |
| कुलगुरु | कुल के गुरु | family preceptor |
| सम | के समान | as much as |
| हित | हित करने वाले | caring for one’s welfare |
| माय | माता | mother |
| न | नहीं | not |
| बापू | पिता | father |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.293
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 588
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 588, 589
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।