अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे भरत! सुनो, हम झूठ नहीं कहते। हम उदासीन हैं (किसीका पक्ष नहीं करते), तपस्वी हैं (किसीकी मुँहदेखी नहीं कहते) और वनमें रहते हैं (किसीसे कुछ प्रयोजन नहीं रखते)। सब साधनोंका उत्तम फल हमें लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजीका दर्शन प्राप्त हुआ॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 518 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।।
सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।।
स्रोत अभिलेख 2.21 · पुस्तक पृ. 517, 518
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।।
English explanation
Listen, Bharata: I do not speak falsely. I am a detached ascetic living in the forest.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनहु | सुनो | listen |
| भरत | भरत, राम के भाई | Bharata, Rama’s brother |
| हम | मैं | I |
| झूठ | झूठ | falsehood |
| न | नहीं | not |
| कहहीं | कहता हूँ | speak |
| उदासीन | सांसारिक आसक्ति से रहित | detached from worldly concerns |
| तापस | तपस्वी | ascetic |
| बन | वन में | in the forest |
| रहहीं | रहता हूँ | live |
2 सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।।
English explanation
I received the beautiful fruit of all my spiritual practices in beholding Lakshmana, Rama, and Sita.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सब | सभी | all |
| साधन | आध्यात्मिक साधनाओं | spiritual practices |
| कर | का | of |
| सुफल | उत्तम फल | excellent fruit; reward |
| सुहावा | सुंदर; सुखद | beautiful; delightful |
| लखन | लक्ष्मण, राम के भाई | Lakshmana, Rama’s brother |
| राम | राम | Rama |
| सिय | सीता, राम की पत्नी | Sita, Rama’s wife |
| दरसनु | दर्शन | the sight of them |
| पावा | मैंने पाया | I obtained |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.21
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 518
- सहायक विषय
- भरतजीका प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 517, 518
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