अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्द[वह बोली—] हे प्राणप्यारे! सुनिये, मेरे मनको भानेवाला एक वर तो दीजिये, भरतको राजतिलक; और हे नाथ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, मेरा मनोरथ पूरा कीजिये—॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 367 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।
मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।
स्रोत अभिलेख 2.29 · पुस्तक पृ. 367, 368
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।
English explanation
Listen, my beloved lord, dear to my heart. Grant one boon: let Bharata be crowned.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनहु | सुनिए | listen |
| प्रानप्रिय | हे प्राणों से प्रिय स्वामी | O lord dear as life |
| भावत | प्रिय लगने वाले | pleasing; dear |
| जी | मन; हृदय | heart |
| का | को | to |
| देहु | दीजिए | grant |
| एक | एक | one |
| बर | वरदान | boon |
| भरतहि | भरत को | to Bharata, Rama’s brother |
| टीका | राजतिलक | coronation |
2 मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।
English explanation
With folded hands, I ask for a second boon. My lord, fulfill my wish.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मागउँ | मैं माँगती हूँ | I ask |
| दूसर | दूसरा | second |
| बर | वरदान | boon |
| कर | हाथ | hands |
| जोरी | जोड़कर | having folded |
| पुरवहु | पूरा कीजिए | fulfill |
| नाथ | हे स्वामी | O my lord |
| मनोरथ | इच्छा | wish |
| मोरी | मेरी | my |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.29
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 367
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 367, 368
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।