अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।।
मूल पाठ
सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।।
धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।
स्रोत अभिलेख 2.15 · पुस्तक पृ. 468, 468
भावार्थ
मूल पाठ के बादमूर्खलोग सुखमें हॢषत होते और दु:खमें रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मनमें दोनोंको समान समझते हैं। हे सबके हितकारी (रक्षक)! आप विवेक विचारकर धीरज धरिये और शोकका परित्याग कीजिये॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 468 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।।
English explanation
The undiscerning rejoice in happiness and lament in sorrow; the steadfast regard both equally in their minds.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुख | सुख में | in happiness |
| हरषहिं | हर्षित होते हैं | rejoice |
| जड़ | अविवेकी लोग | the undiscerning |
| दुख | दुःख में | in sorrow |
| बिलखाहीं | बिलखते हैं | lament |
| दोउ | दोनों को | both |
| सम | समान | equal |
| धीर | धैर्यवान लोग | the steadfast |
| धरहिं | रखते हैं | hold |
| मन | मन | the mind |
| माहीं | में | within |
2 धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।
English explanation
Reflect with discernment and remain patient. You who seek everyone's welfare, relinquish your worry.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| धीरज | धैर्य | patience |
| धरहु | धारण कीजिए | maintain |
| बिबेकु | विवेक | discernment |
| बिचारी | विचार करके | having reflected |
| छाड़िअ | छोड़ दीजिए | relinquish |
| सोच | चिंता | worry |
| सकल | सबका | of everyone |
| हितकारी | हे हित करने वाले | O benefactor |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.15
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 468
- सहायक विषय
- दशरथ-सुमन्त्र-संवाद, दशरथ-मरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 468, 468
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।