अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।
मूल पाठ
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ।।
स्रोत अभिलेख 2.229 · पुस्तक पृ. 534, 535
भावार्थ
मूल पाठ के बादसहस्रबाहु, देवराज इन्द्र और त्रिशंकु आदि किसको राजमदने कलङ्क नहीं दिया? भरतने यह उपाय उचित ही किया है। क्योंकि शत्रु और ऋणको कभी जरा भी शेष नहीं रखना चाहिये॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 534 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।
English explanation
AI-draft meaning: Sahasrabahu, Indra, and Trishanku—whom has the arrogance of royal power not disgraced?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सहसबाहु | सहस्रबाहु, हजार भुजाओं वाला राजा | Sahasrabahu, the thousand-armed king |
| सुरनाथु | देवताओं के स्वामी इंद्र | Indra, lord of the gods |
| त्रिसंकू | राजा त्रिशंकु | King Trishanku |
| केहि | किसे | whom |
| न | नहीं | not |
| राजमद | राजसत्ता का घमंड | arrogance of royal power |
| दीन्ह | दिया | gave |
| कलंकू | कलंक; बदनामी | disgrace; dishonor |
2 भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ।।
English explanation
Bharata has adopted this fitting strategy: never leave even a trace of an enemy or a debt outstanding.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | राम के भाई भरत | Bharata, Rama’s brother |
| कीन्ह | किया | did; adopted |
| यह | यह | this |
| उचित | उचित; उपयुक्त | fitting; appropriate |
| उपाऊ | उपाय | strategy; means |
| रिपु | शत्रु | enemy |
| रिन | ऋण; कर्ज | debt |
| रंच | जरा भी; थोड़ा-सा अंश | even a trace |
| न | नहीं | not |
| राखब | शेष रखना चाहिए | should leave remaining |
| काऊ | कभी भी | ever; at any time |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.229
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 534
- सहायक विषय
- श्रीसीताजीका स्वप्न, श्रीरामजीको कोल-किरातोंद्वारा भरतजीके आगमनकी सूचना, रामजीका शोक, लक्ष्मणजीका क्रोध
- मुद्रित पृष्ठ
- 534, 535
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।