अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई।।
मूल पाठ
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई।।
अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।।
स्रोत अभिलेख 2.301 · पुस्तक पृ. 595, 596
भावार्थ
मूल पाठ के बादवह रुचि है—कपट, स्वार्थ और [अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप] चारों फलोंको छोड़कर स्वाभाविक प्रेमसे स्वामीकी सेवा करना। और आज्ञापालनके समान श्रेष्ठ स्वामीकी और कोई सेवा नहीं है। हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवकको मिल जाय॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 595 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई।।
English explanation
My desire is to serve my master with spontaneous love, abandoning self-interest, deceit, and the rewards of the four aims of life.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सहज | स्वाभाविक; निष्कपट | natural; spontaneous |
| सनेहँ | प्रेम से | with love |
| स्वामि | स्वामी की | of the master |
| सेवकाई | सेवा | service |
| स्वारथ | निजी स्वार्थ | self-interest |
| छल | कपट | deceit |
| फल | फल; प्राप्तियाँ | fruits; rewards |
| चारि | चारों | all four |
| बिहाई | त्यागकर | having relinquished |
2 अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।।
English explanation
No service to a good master equals obeying his command. O Lord, may this servant receive that favor.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अग्या | आज्ञा का पालन | obedience to the command |
| सम | के समान | equal to |
| न | नहीं | not; none |
| सुसाहिब | उत्तम स्वामी की | of a good master |
| सेवा | सेवा | service |
| सो | वही | that very |
| प्रसादु | अनुग्रह; कृपा | favor; grace |
| जन | यह सेवक | this servant |
| पावै | पाए; प्राप्त करे | may receive |
| देवा | हे प्रभु | O Lord |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.301
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 595
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 595, 596
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।