अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।।
मूल पाठ
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।।
प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई।।
स्रोत अभिलेख 2.301 · पुस्तक पृ. 595, 596
भावार्थ
मूल पाठ के बादभरतजी ऐसा कहकर प्रेमके बहुत ही विवश हो गये। शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया। अकुलाकर (व्याकुल होकर) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमल पकड़ लिये। उस समयको और स्नेहको कहा नहीं जा सकता॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 595 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।।
English explanation
Saying this, Bharata was deeply overcome with love; his body thrilled, and tears filled his eyes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | thus; this |
| कहि | कहकर | having said |
| प्रेम | प्रेम से | by love |
| बिबस | अभिभूत; अपने वश में न रहे | overwhelmed |
| भए | हो गए | became |
| भारी | अत्यंत | deeply; exceedingly |
| पुलक | रोमांच | thrill; hair standing on end |
| सरीर | शरीर | body |
| बिलोचन | आँखों में | in the eyes |
| बारी | आँसू; जल | tears; water |
2 प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई।।
English explanation
In emotional agitation, Bharata clasped the Lord’s lotus feet. That moment and that love cannot be described.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | प्रभु राम के | of Lord Rama |
| पद | चरण | feet |
| कमल | कमल | lotuses |
| गहे | पकड़ लिए | clasped |
| अकुलाई | व्याकुल होकर | in agitation |
| समउ | समय; वह अवसर | time; that moment |
| सनेहु | प्रेम | love |
| न | नहीं | not |
| सो | वह | that |
| कहि | कहा; वर्णित किया | said; described |
| जाई | जा सकता | can be |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.301
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 595
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 595, 596
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