अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।।
मूल पाठ
समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।।
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।।
स्रोत अभिलेख 2.233 · पुस्तक पृ. 537, 538
भावार्थ
मूल पाठ के बादभरतजी अपनी माता कैकेयीकी करनीको समझकर (याद करके) सकुचाते हैं और मनमें करोड़ों (अनेकों) कुतर्क करते हैं [सोचते हैं—] श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी मेरा नाम सुनकर स्थान छोड़कर कहीं दूसरी जगह उठकर न चले जायँ॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 538 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।।
English explanation
Recalling his mother Kaikeyi’s deeds, Bharata feels ashamed and entertains countless anxious conjectures in his mind.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| समुझि | याद करके; विचार करके | recalling; considering |
| मातु | माता कैकेयी के | of his mother Kaikeyi |
| करतब | किए हुए काम | deeds |
| सकुचाहीं | संकोच करते हैं; लज्जित होते हैं | feels abashed; feels ashamed |
| करत | करते हैं | entertains |
| कुतरक | आशंकापूर्ण उलटे तर्क | anxious, unfounded conjectures |
| कोटि | करोड़ों; असंख्य | millions; countless |
| मन | मन | mind |
| माहीं | में | within |
2 रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।।
English explanation
Bharata fears: might Rama, Lakshmana, and Sita hear my name, rise, and leave this place for somewhere else?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रामु | राम | Rama |
| लखनु | लक्ष्मण | Lakshmana |
| सिय | सीता | Sita |
| सुनि | सुनकर | on hearing |
| मम | मेरा | my |
| नाऊँ | नाम | name |
| उठि | उठकर | having risen |
| जनि | कहीं ऐसा न हो कि | lest |
| अनत | अन्यत्र | elsewhere |
| जाहिं | चले जाएँ | go away |
| तजि | छोड़कर | leaving |
| ठाऊँ | स्थान | this place |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.233
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 538
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 537, 538
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।